भोपाल

भोपाल में 250 युवतियों ने सीखी तलवार और बंदूक चलाना, दुर्गा वाहिनी के शिविर में मिली आत्मरक्षा की ट्रेनिंग

भारत द्वारा की गई एयर स्ट्राइक के जवाब में पाकिस्तान के साथ बढ़े तनाव के माहौल के बीच, भोपाल में एक खास आत्मरक्षा प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया। इस शिविर में मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों की 250 युवतियों और महिलाओं ने भाग लिया, जिन्हें तलवार, लाठी, बंदूक और कराटे जैसे कौशल सिखाए गए।

दुर्गा वाहिनी ने आयोजित किया 7 दिवसीय आत्मरक्षा शिविर

2 से 9 मई तक भोपाल के शारदा विहार में आयोजित इस शिविर का आयोजन विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के अनुषांगिक संगठन दुर्गा वाहिनी द्वारा किया गया। इसमें प्रतिभागियों को केवल आत्मरक्षा ही नहीं, बल्कि योग, प्राणायाम, अनुशासित दिनचर्या और वैदिक जीवनशैली की भी शिक्षा दी गई।

भोपाल की अंजली त्यागी बोलीं – “अब हम खुद को और दूसरों को भी बचा सकते हैं”

आत्मरक्षा प्रशिक्षण लेने वाली अंजली त्यागी ने कहा,

“मैं जब इस शिविर में आई थी, तब नहीं सोचा था कि तलवार और बंदूक चलाना भी सीखूंगी। अब मुझे लगता है कि हर बहन को आत्मरक्षा आनी चाहिए। हम समाज में लव जिहाद जैसी चीज़ों पर भी जागरूकता फैला रहे हैं। सोशल मीडिया के ज़रिए होने वाले फर्जीवाड़ों से लड़ने के लिए हम तैयार हैं।”

पलक यदुवंशी: “एक प्रशिक्षित बहन, दस बहनों को दे प्रशिक्षण”

बुधनी की पलक यदुवंशी, जो राइफल प्रशिक्षण की विशेषज्ञ हैं, ने कहा कि अब वक्त है कि हर गांव-शहर की बहनें आत्मनिर्भर और आत्मसुरक्षित बनें। उन्होंने कहा,

“अगर हर प्रशिक्षित बहन दस और बहनों को ट्रेनिंग दे, तो हम समाज को मजबूत बना सकते हैं।”

दंड(लाठी चलाने का प्रदर्शन करतीं छात्राएं)

सीखाई गईं ये प्रमुख विधाएं

  • कराटे और लाठी चलाना (दंड अभ्यास)
  • तलवार चलाना और यष्टि (छोटे दंड)
  • राइफल से लक्ष्य भेद (निशानेबाजी)
  • योग, ध्यान और वैदिक दिनचर्या
  • प्रातः और सांध्य प्रार्थना के साथ अनुशासन

सामाजिक और मानसिक सशक्तिकरण की ओर कदम

इस शिविर के माध्यम से केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक सशक्तिकरण पर भी बल दिया गया। लड़कियों को सिर्फ लड़ना ही नहीं, बल्कि सोचने और समाज को समझने की दिशा में भी प्रशिक्षित किया गया।

इस तरह के शिविर न केवल आत्मरक्षा का माध्यम हैं, बल्कि महिलाओं को अपने अधिकारों, सुरक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी को समझने का मंच भी प्रदान करते हैं। ये पहल दर्शाती है कि अब बेटियां किसी की मोहताज नहीं, बल्कि खुद की रक्षक बन रही हैं।

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