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विक्रम संवत: भारत की सांस्कृतिक धरोहर और राष्ट्रीय गौरव की पुनर्स्थापना

भारतवर्ष को विदेशी आक्रांताओं से मुक्त कराने वाले उज्जयिनी के प्रतापी राजा सम्राट विक्रमादित्य की महाविजय और राष्ट्र गौरव की पुनर्स्थापना का कालजयी ‍अभिनंदन है। जो हमें एक नई ऊर्जा और आत्मविश्वास से भर देता है। यह बेमिसाल ताकत उस विक्रम सम्वत् की है, जिसे महाकाल की नगरी उज्जयिनी के पराक्रमी राजा सम्राट विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रांता शकों को देश की सीमाओं से खदेड़कर निर्णायक रूप से विजय को शाश्वत करने के उपलक्ष्य में 57 ईसवी पूर्व चलाया था। विडंबना यह है कि भारत का आधिकारिक राष्ट्रीय पंचांग शक संवत है।

विक्रम संवत और भारत का सांस्कृतिक गौरव

शुद्ध कालगणना अथवा कालक्रम को आधार बनाने की बजाय यदि इतिहास की प्रवृत्तियों और उसके राजनीतिक, भावनात्मक पक्ष को समझें तो विक्रम संवत ही भारत का राष्ट्रीय पंचांग कहलाने का हकदार है। वैसे भी लोक समाज इतिहास को अपने ढंग से संजोता और संरक्षित करता है। आज भी हमारे सभी तीज त्यौहार, संस्कार व ज्योतिष गणनाएँ ज्यादातर विक्रम सम्वत् के हिसाब से ही होती हैं न कि शक सम्वत् के। इसका सीधा अर्थ यही है कि आज भी विक्रम सम्वत् सर्वमान्‍य है।

विक्रम संवत का वैज्ञानिक और कालगणनात्मक महत्व

विक्रम संवत भारत के अनेक संवतों में सर्वाधिक जीवनी शक्ति के रूप में उपस्थित रहा और आज भी प्रयोग में है। समूचे उत्तर भारत में तो यह जन्म से लेकर अंत तक प्रयुक्त होता है। यह सम्वत् चंद्रमा पर आधारित है। विक्रम संवत को पहले कृत सम्वत् के नाम से जाना जाता था। कुछ शिलालेखों में मालवगण का सम्वत् उल्लिखित है, जैसे-नरवर्मा का मंदसौर शिलालेख। इसमें ‘कृत’ एवं ‘मालव’ सम्वत् एक ही कहे गये हैं।


राजस्थान के बरनाला में मिले एक‍ प्राचीन शिलालेख में ‘विक्रम संवत’ का उल्लेख है। विक्रम सम्वत् का एक महत्वपूर्ण उल्लेख गुजरात के काठियावाड़ के ओखामंडल के पूर्व राजा जयकदेव के शिलालेख में मिलता है। इस शिलालेख के स्थापना वर्ष में विक्रम सम्वत् 794 का उल्लेख है, जो ईसवी सन् के हिसाब से वर्ष 737 होता है। भारत में मुस्लिम शासकों के सत्ता पर काबिज होने तक देश में मुख्य रूप से विक्रम और शक सम्वत् ही प्रचलन में थे।

विक्रम संवत का ऐतिहासिक और पुरातात्विक प्रमाण

बौद्ध साहित्य में भी इसका उल्लेख मिलता है। नेपाल के पूर्व राणा राजवंश ने 1901 में विक्रम संवत को ही नेपाल के अधिकृत हिंदू कैलेंडर के रूप में मान्य किया था। भारत सरकार को भी विक्रम सम्वत् को राष्ट्रीय पंचांग के रूप स्वीकार करने की दिशा में ठोस अकादमिक प्रयास करने चाहिए।


विक्रम संवत का आरंभ गुजरात में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से और उत्तर भारत में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से माना जाता है। मान्‍यता है कि वर्ष में 12 माह और 7 दिन का एक सप्ताह मान्य करने का प्रारंभ विक्रम सम्वत् से ही हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर आधारिक है। ये बारह राशियाँ ही 12 सौर मास हैं।

जिस दिन सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है उसी दिन संक्रान्ति होती है। पूर्णिमा के दिन, चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है। चंद्र वर्ष, सौर वर्ष से 11 दिन 3 घटी 48 पल छोटा है, इसीलिए प्रत्येक 3 वर्ष में इसमें 1 महीना जोड़ दिया जाता है। ‍जिसे ‘अधिक मास’ कहते हैं।

जिस दिन नव संवत का आरम्भ होता है, उस दिन के वार के अनुसार वर्ष के राजा का निर्धारण होता है। विक्रम सम्‍वत् भारतीय संस्कृति, विज्ञान और परंपरा का परिचायक है। इसे सरकारी स्तर पर अपनाने से देश की सांस्कृतिक पहचान मजबूत होगी और भारतीय समाज में एकरूपता आएगी।

भारत सरकार को विक्रम संवत को आधिकारिक कैलेंडर के रूप में अपनाने की आवश्यकता

भारत सरकार को चाहिए कि वह विक्रम सम्‍वत् को आधिकारिक कैलेंडर घोषित करे और इसे राष्ट्रीय गौरव के रूप में पुनर्स्थापित करे। इससे न केवल भारतीय समाज में आत्मगौरव बढ़ेगा, बल्कि प्रशासनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी देश को लाभ होगा।

श्रीराम तिवारी का दृष्टिकोण

मुख्यमंत्री जी के संस्कृति सलाहकार श्रीराम तिवारी का विचार विक्रम सम्वत् को पुनर्स्थापित करने के लिए कदम उठाने का सुझाव

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