शुक्रवार की सुबह खंडवा के कोंडावत गांव में ऐसा मंजर देखने को मिला, जिसने हर आंख को नम और हर दिल को दहला दिया। गांव के मुक्तिधाम में एक साथ आठ चिताएं सुलग रही थीं, और वहां मौजूद हर शख्स की सिसकियां हवा में गूंज रही थीं।
एक बेटी अपने पिता को मुखाग्नि दे रही थी, उसका चेहरा देखकर आसपास खड़े लोग अपने आंसू नहीं रोक सके। यह दृश्य सिर्फ एक अंतिम विदाई नहीं था, बल्कि उस दर्द की गवाही था, जो एक पल में पूरे गांव को शोक के सागर में डुबो गया।
गणगौर की तैयारी बनी काल
यह सब गुरुवार शाम छैगांवमाखन क्षेत्र के कोंडावत गांव में शुरू हुआ। गणगौर विसर्जन की तैयारियों के बीच 35 साल के अर्जुन पटेल एक पुराने कुएं की सफाई के लिए उतरे। कुआं लंबे समय से बंद पड़ा था, और गांव की नाली का गंदा पानी इसमें जमा होकर दलदल और जहरीली गैस का घर बन गया था। जैसे ही अर्जुन नीचे पहुंचे, जहरीली गैस-शायद मीथेन या हाइड्रोजन सल्फाइड-ने उन्हें घेर लिया। वह बेसुध होकर दलदल में डूबने लगे। उनकी चीख सुनकर पहले उनके भाई, फिर दोस्त, और फिर गांव के सात और लोग उन्हें बचाने कूद पड़े। लेकिन यह कुआं किसी को जिंदा बाहर नहीं आने देना चाहता था। एक-एक कर आठ जिंदगियां उस गहरे अंधेरे में खो गईं।
मरने वालों में थे:
राकेश (21), पिता हरी पटेल वासुदेव (40), पिता आसाराम पटेल अर्जुन (35), पिता गोविंद पटेल गजानंद (35), पिता गोपाल पटेल मोहन (48), पिता मंसाराम पटेल अजय (25), पिता मोहन पटेल शरण (40), पिता सुखराम पटेल अनिल (28), पिता आत्माराम पटेल
रेस्क्यू की कोशिश

दोपहर से शुरू हुआ यह हादसा शाम तक एक भयानक सच्चाई बन गया। जब कोई बाहर नहीं निकला, तो ग्रामीणों ने पुलिस और प्रशासन को बुलाया। SDERF की 15 सदस्यीय टीम रस्सियां और जाल लेकर मौके पर पहुंची। तीन घंटे तक चले रेस्क्यू ऑपरेशन में हर शव को बाहर निकाला गया, लेकिन जिंदगी की कोई उम्मीद बाकी नहीं थी। रात 12 बजे तक जिला अस्पताल में पोस्टमॉर्टम चला। डॉक्टरों की टीम ने हर शव को देखा, लेकिन जहरीली गैस का कहर ऐसा था कि किसी को बचाने का मौका ही नहीं मिला।
शुक्रवार का मातम: 8 चिताओं की लपटें
शुक्रवार सुबह साढ़े आठ बजे शवों को अलग-अलग वाहनों में गांव लाया गया। हर घर से चीखें उठ रही थीं। अंतिम श्रद्धांजलि के बाद सभी शव मुक्तिधाम पहुंचे। वहां एक साथ आठ चिताएं तैयार की गईं। आसपास के गांवों से आए लोग भी इस दुख में शामिल हुए। लेकिन सबसे मार्मिक पल तब आया, जब मोहन पटेल की बेटी ने अपने पिता को मुखाग्नि दी। उसकी कांपती उंगलियों और आंसुओं से भरी आंखों ने हर किसी का दिल तोड़ दिया। एक ग्रामीण ने कहा, “उसके चेहरे पर दर्द ऐसा था, जैसे उसने सब कुछ खो दिया। हम सब रो पड़े।”
गांव की चुप्पी, आंसुओं की गूंज
कोंडावत अब सन्नाटे में डूबा है। जो गांव गणगौर की खुशियों की तैयारी में जुटा था, वहां अब सिर्फ मातम की आवाजें हैं। अर्जुन की मां अपने बेटे की याद में बेसुध पड़ी हैं, तो राकेश की बहन बार-बार कह रही है, “वह तो सिर्फ 21 साल का था, उसे क्यों ले गए?” हर घर में एक जैसा दर्द है-कोई अपने भाई को खो रहा है, कोई पिता को, तो कोई दोस्त को। आसपास के गांवों से आए लोग भी इस दुख को बांटने आए, लेकिन कोई शब्द इस घाव को कम नहीं कर सका।
प्रशासन का कदम: मदद का ऐलान,
कुआं बंद प्रशासन ने इस त्रासदी के बाद हर मृतक के परिवार को 4-4 लाख रुपये की आर्थिक मदद देने का ऐलान किया। SDM बजरंग बहादुर ने कहा, “यह बेहद दुखद हादसा है। हम कुएं को तोड़कर मुरुम से भर देंगे, ताकि आगे ऐसा कुछ न हो।” लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि यह मदद उनके अपनों को वापस नहीं ला सकती। एक बुजुर्ग ने सवाल उठाया, “अगर पहले इस कुएं की जांच होती, तो क्या यह दिन देखना पड़ता?”
जहरीला कुआं: मौत का जाल

यह कुआं गांव के बीचोंबीच था, लेकिन इसकी हालत किसी को नहीं दिखी। नाली का गंदा पानी इसमें जमा होकर दलदल और जहरीली गैस का कारण बन गया। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी जगहों पर जहरीली गैस बनना आम है, लेकिन बिना जागरूकता और सुरक्षा के यह हादसा टाला नहीं जा सका। अर्जुन से शुरू हुई यह कहानी आठ परिवारों के लिए अंत बन गई।
सोशल मीडिया पर शोक
सोशल मीडिया पर भी यह खबर छा गई। लोग #KondawatTragedy के साथ अपनी संवेदनाएं जता रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, “एक कुआं आठ जिंदगियां ले गया। यह दुख बयां नहीं हो सकता।” कई लोग प्रशासन से ऐसी जगहों की जांच की मांग कर रहे हैं। कोंडावत की यह त्रासदी सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। आठ चिताओं की लपटों ने न सिर्फ लकड़ियां जलाईं, बल्कि गांव की खुशियों को भी राख कर दिया। अब बचे हैं सिर्फ आंसू, यादें और वो सवाल-क्या यह दुख टाला जा सकता था?

