भोपाल: मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण को लेकर चल रहे लंबे कानूनी संघर्ष में एक बार फिर देरी हो गई है। सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार की ओर से अदालत से और समय की मांग की। उनका कहना था कि इस मामले में कई तकनीकी और संवैधानिक पहलुओं को समझने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता है। कोर्ट ने उनकी इस दलील को स्वीकार करते हुए अगली सुनवाई नवंबर के पहले हफ्ते में तय की है।

क्या है मामला?
मध्यप्रदेश में पूर्ववर्ती कमलनाथ सरकार द्वारा 2019 में ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% कर दिया गया था। लेकिन इस निर्णय को लेकर कानूनी चुनौतियां सामने आईं और मामला हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। फिलहाल, 13% अतिरिक्त आरक्षण (14% से 27% के बीच का हिस्सा) पर रोक लगी हुई है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
बुधवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिए थे कि यह मामला वापस मध्यप्रदेश हाईकोर्ट को भेजा जा सकता है, क्योंकि हाईकोर्ट का अभी तक इस पर अंतिम फैसला नहीं आया है। बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट राज्य की जनसांख्यिकी (Demography), भूगोल (Topography) और स्थानीय परिस्थितियों को बेहतर समझता है, इसलिए निर्णय वहीं से आना उपयुक्त होगा।
कोर्ट ने यह भी संकेत दिए कि 13% आरक्षण पर लगी रोक (hold) को हटाने पर विचार किया जा सकता है, ताकि भर्ती प्रक्रियाएं बाधित न हों। हालांकि अब इस पर अंतिम फैसला नवंबर में होगा।
पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही पर प्रतिक्रिया देते हुए सवाल उठाया कि सरकार बार-बार समय क्यों मांग रही है? उन्होंने कहा कि पिछली सुनवाई में भी सरकार बिना तैयारी के पहुंची थी, और इस बार भी वही दोहराया गया।

MP हाईकोर्ट का रुख क्या रहा है?
28 जनवरी 2025 को MP हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 87:13 फॉर्मूले को अस्वीकार कर दिया था। यह फॉर्मूला आरक्षण लागू करने के लिए अपनाया गया था, जिसे कोर्ट ने न्यायसंगत नहीं माना।
2019 में 27% आरक्षण पर लगाई गई अंतरिम रोक (Stay) को कोर्ट ने इस आधार पर सही ठहराया था कि कुल आरक्षण सीमा 50% से अधिक न हो।
बाद में हाईकोर्ट ने उन याचिकाओं को “not maintainable” करार दिया जो इस 27% आरक्षण के विरोध में थीं, क्योंकि वे संशोधन कानून की संवैधानिकता को चुनौती नहीं दे रही थीं।
कोर्ट ने कहा था कि जब तक सुप्रीम कोर्ट से अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक 13% अतिरिक्त ओबीसी आरक्षण भर्ती प्रक्रियाओं में लागू किया जा सकता है।
ओबीसी आरक्षण का मुद्दा सिर्फ आरक्षण की सीमा का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, राजनीतिक इच्छाशक्ति और संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। बार-बार समय मांगना सरकार की गंभीरता पर सवाल खड़ा करता है, खासकर तब जब यह मुद्दा लाखों पिछड़े वर्गों के अधिकारों से जुड़ा हो।
अब निगाहें नवंबर की सुनवाई पर हैं, जहां यह तय होगा कि क्या 13% अतिरिक्त आरक्षण पर लगी रोक हटेगी या मामला और लंबा खिंचेगा।

