सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि अब गोद लेने वाली महिलाओं को भी मैटरनिटी लीव का पूरा अधिकार मिलेगा, चाहे बच्चा किसी भी उम्र का हो। अदालत ने कहा कि मातृत्व केवल जन्म देने तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चे की देखभाल और परवरिश भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इस फैसले के साथ ही Code on Social Security, 2020 की वह शर्त रद्द कर दी गई है, जिसमें सिर्फ 3 महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने पर ही मातृत्व अवकाश मिलता था।
क्या था पुराना नियम?
अब तक के नियमों के अनुसार, गोद लेने वाली महिलाओं को केवल तभी 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव मिलती थी, जब बच्चा 3 महीने से कम उम्र का हो। 3 महीने से अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेने पर यह सुविधा नहीं मिलती थी, जिससे कई महिलाएं इस अधिकार से वंचित रह जाती थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का उल्लंघन करता है। अदालत ने साफ कहा कि दत्तक और जैविक बच्चे में कोई अंतर नहीं है और मातृत्व एक मानवाधिकार है। साथ ही, परिवार बनाने के गैर-जैविक तरीकों को भी समान मान्यता दी जानी चाहिए।
अब क्या बदलेगा?
इस फैसले के बाद अब हर उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं को मैटरनिटी लीव का लाभ मिलेगा। इसका असर सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं पर पड़ेगा। अब कोई भी संस्था या कंपनी सिर्फ बच्चे की उम्र के आधार पर छुट्टी देने से इनकार नहीं कर सकेगी।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) पर भी विचार करने को कहा है, जिससे भविष्य में पिता को भी बच्चे की देखभाल के लिए छुट्टी मिल सकती है।
क्यों है यह फैसला महत्वपूर्ण?
यह निर्णय सिर्फ कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक सोच में भी बड़ा परिवर्तन है। इससे गोद लेने को बढ़ावा मिलेगा, बच्चों को बेहतर परवरिश मिलेगी और महिलाओं के साथ होने वाला भेदभाव कम होगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले से यह स्पष्ट कर दिया है कि मां होने का मतलब सिर्फ जन्म देना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाना है।

